देवा धामी: पहाड़ की लोकसंस्कृति से बड़े पर्दे तक का प्रेरणादायक सफर
देवा धामी, जिनका वास्तविक नाम दीपक सिंह धामी है, उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ जिले के मड़मानले गाँव से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता कैप्टन चन्दन सिंह धामी भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी हैं, जबकि उनकी माता श्रीमती जयंती धामी हैं।
बचपन से ही अनुशासन और सांस्कृतिक माहौल में पले-बढ़े देवा धामी की प्रारम्भिक शिक्षा उत्तराखण्ड में हुई। इसके बाद उन्होंने अरुणाचल प्रदेश और पंजाब के पठानकोट में शिक्षा प्राप्त की, जहाँ उन्हें विभिन्न संस्कृतियों को करीब से समझने का अवसर मिला। उन्होंने उत्तराखण्ड से वाणिज्य (कॉमर्स) विषय में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से जनसंचार में स्नातकोत्तर किया।
रंगमंच से शुरू हुआ अभिनय का सफर
छात्र जीवन के दौरान देवा धामी पिथौरागढ़ के नवोदय पर्वतीय कला केंद्र से जुड़े। यहीं उन्होंने उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति और लोक परंपराओं को गहराई से समझा। इसी अनुभव ने उनके अभिनय सफर की मजबूत नींव रखी।
इसके बाद उन्होंने लगभग तीन वर्षों तक थिएटर में सक्रिय रूप से काम किया और 20 से अधिक नाटकों में अभिनय किया। रंगमंच ने उनके अभिनय को न केवल निखारा, बल्कि उन्हें पहाड़ की संस्कृति और समाज से गहराई से जोड़ने का काम भी किया।
मीडिया से विज्ञापन और टेलीविज़न तक
रंगमंच के साथ-साथ देवा धामी मीडिया क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। उन्होंने कुछ समय तक इंडिया न्यूज़ में विभागाध्यक्ष (HOD) के पद पर कार्य किया। हालांकि अभिनय के प्रति उनका जुनून लगातार बना रहा।
इसी दौरान वे विज्ञापनों, टेलीविज़न प्रोजेक्ट्स और विभिन्न ब्रांड अभियानों से जुड़े। वे 30 से अधिक विज्ञापनों में काम कर चुके हैं और आज भी कई प्रतिष्ठित ब्रांड्स के साथ ब्रांड एंबेसडर के रूप में जुड़े हुए हैं।
‘छोलियार’ से पहाड़ की लोकसंस्कृति को नई पहचान
अभिनय के सफर में आगे बढ़ते हुए देवा धामी ने उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति को बड़े पर्दे पर नई पहचान दिलाने का संकल्प लिया। उनकी चर्चित फिल्म ‘छोलियार’ ने उत्तराखण्ड के पारंपरिक छोलिया नृत्य को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
देवा धामी का सफर इस बात की मिसाल है कि जब प्रतिभा, अनुशासन और अपनी संस्कृति के प्रति समर्पण एक साथ आते हैं, तो स्थानीय पहचान भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मजबूत जगह बना सकती है। उनका प्रयास उत्तराखण्ड की लोककला, परंपराओं और पहाड़ी संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुँचाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान है।